22-11-2017 07:28:am
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भोपाल। मध्यप्रदेश में ये पहला मौका है, जब 14 साल से काबिज भाजपा को लगातार दूसरी बार विधानसभा उपचुनाव में हार का स्वाद चखना पड़ा है। रविवार को घोषित हुए चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव के परिणाम में कांग्रेस प्रत्याशी नीलांशु चतुर्वेदी विजयी हुए हैं। उन्होंने अपने निकटतम प्रत्याशी भाजपा के शंकर दयाल त्रिपाठी को 14,133 मतों के अंतर से हरा दिया। भाजपा की हार के पीछे सबसे बड़ा कारण उम्मीदवार का गलत चयन बताया जा रहा है। इसकी वजह से प्रदेश की सरकारी मशीनरी के अलावा केंद्रीय नेताओं का जमावड़ा भी कुछ नहीं कर सका। इससे पहले 13 अप्रैल को अटेर विधानसभा उपचुनाव में भी कांग्रेस के उम्मीदवार हेमंत कटारे विजयी हुए थे। अगले महीने गुजरात और 2018 में मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिहाज से कांग्रेस की यह जीत अहम मानी जा रही है।

अटेर और चित्रकूट : एक जैसा समीकरण

दिलचस्प पहलू यह है कि अटेर और चित्रकूट दोनों ही विधानसभाओं में भाजपा के प्रत्याशी को लेकर भारी विरोध था। सूत्रों की मानें तो प्रदेश भाजपा चुनाव समिति की रिपोर्ट में शंकर दयाल त्रिपाठी का नाम ही नहीं था। बावजूद, त्रिपाठी को चुनावी समर में धकेल दिया गया।

केंद्रीय मंत्री भी पहुंचे

चित्रकूट में भाजपा नेताओं ने 750 से ज्यादा सभाएं कीं। मुख्यमंत्री तीन दिन रुके और 29 सभाएं व 11 रोड शो किए। प्रदेश के दर्जनभर मंत्रियों के अलावा उत्तरप्रदेश के डिप्टी सीएम केशवप्रसाद मौर्य रोड शो में उतरे थे। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे।

जिस तुर्रा गांव में रुके थे सीएम, वहां भी हारे

तुर्रा गांव में मुख्यमंत्री ने आदिवासी लालमन के घर रात्रि विश्राम किया था। यहां भाजपा को 203 एवं कांग्रेस को 413 वोट मिले। सीएम चुनाव प्रचार के दौरान तुर्रा सरपंच ऊषा गौड़ के यहां रुकने की मंशा से पहुंचे थे लेकिन पता चला कि वहां शौचालय नहीं है। उसके बाद सीएम उसी गांव के दूसरे आदिवासी लालमन के घर पहुंचे। चुनावी प्रबंधकों ने रातोरात लालमन आदिवासी के घर प्लाई के शौचालय से लेकर फाइव स्टार सुविधाओं का इंतजाम किया था। लालसिंह को लगा था, उसके अच्छे दिन आ गए, लेकिन सीएम के जाते ही सारी सुविधाएं गायब हो गर्इं। इसका असर भाजपा प्रत्याशी के चुनाव पर पड़ा।

ससुराल में हार, घर में जीते

भाजपा प्रत्याशी शंकर दयाल त्रिपाठी को उनके ही ससुराल के मतदाताओं ने नकार दिया। उनकी ससुराल सतना जिले के सिंहपुर में है, जहां वे 323 मतों के अंतर से हारे, जबकि अपने गृह गांव देऊरा में वे 295 मतों के अंतर से जीते हैं। उन्हें सेबोटेज का भी सामना करना पड़ा।

कांग्रेस के लिए संजीवनी, बीजेपी के लिए खतरे की घंटी

चित्रकूट विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस की जीत प्रदेश में उसकी वापसी की राह बना सकती है। वहीं भाजपा को इस हार से सतर्क हो जाना चाहिए। उसके लिए यह खतरे की घंटी है। कारण, अटेर के बाद विधानसभा उपचुनाव में उसकी लगातार यह दूसरी हार है। हालांकि यह दोनों सीटें पहले भी कांग्रेस के पास थीं। लेकिन फिर भी संकेत साफ है कि एंटी इनकम्बैंसी फेक्टर चल पड़ा है, बल्कि यह कहें कि लोग सरकार के कामकाज से खुश नहीं हैं। नोटबंदी और जीएसटी से लोगों को हुई परेशानी को सरकार भले नहीं मान रही, पर यह भी हार का कारण हैं। किसानों के लिए सरकार कितनी ही योजनाएं कागजों पर बना ले, पर जमीनी स्तर पर उन्हें राहत नहीं मिलने से वह नाराज हैं। इसी का परिणाम है कि पूरी सरकार झोंक देने, भाजपा के विभिन्न नेताओं की 750 सभाएं होने, स्वयं सीएम द्वारा तीन दिन डेरा डाल 29 सभाएं और 11 रोड शो करने के बाद भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। जब जनता परेशान होती है तो वह जीत के सारे मैनेजमेंट फंडों के बाद भी उलट परिणाम देती है। इसलिए भाजपा के लिए अभी भी समय है कि संभल जाए। वहीं कांग्रेस भी अगर एकजुट हो सही प्रत्याशियों को उतारे तो वह आगामी विधानसभा चुनाव में उलटफेर कर अपना वनवास खत्म कर पुन: प्रदेश में सत्ता में आ सकती है। दोनों ही पार्टियों के लिए यह गहन विचार-विमर्श कर अभी से रणनीति बनाने का समय है।

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