24-06-2018 10:36:pm
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भोपाल यह बानगी है मप्र में लागू पदोन्नति में आरक्षण नियम- 2002 के कारण प्रमोशन पिरामिड के एकतरफा हो जाने की। मप्र लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, पशुपालन विभाग, कृषि विभाग से लेकर विद्युत वितरण कंपनियों तक में विभागाध्यक्ष से लेकर पदोन्नति से भरे जाने वाले पदों पर सिर्फ अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के ही अधिकारी पदस्थ हो चुके हैं। ऐसा अभी करीब आधा दर्जन विभागों में हो चुका है और डेढ़ दर्जन विभागों में आने वाले पांच सालों में हो जाएगा, जबकि अधिकांशत: विभागों में अगले दस सालों में पदोन्नति से भरे जाने वाले पदों पर सिर्फ और सिर्फ आरक्षित वर्गों के ही मुलाजिम होंगे। इसी का गैर आरक्षित वर्ग के मुलाजिम विरोध कर रहे हैं।

उदाहरण बन चुके हैं दर्जनों विभाग

पीएचई में चीफ इंजीनियर स्तर के 5 स्वीकृत पदों में से भरे 3 एवं प्रतिनियुक्ति से एक चीफ इंजीनियर, सभी आरक्षित श्रेणी के हैं। प्रमुख अभियंता के 2 स्वीकृत पदों, जो वर्तमान में रिक्त हैं, के प्रभार में भी इसी वर्ग के अधिकारी हैं। जबकि,अधीक्षण यंत्री स्तर पर इस वर्ग का प्रतिशत 65% से अधिक है। इसी तरह शुपालन विभाग में संचालक, सहायक संचालक, संयुक्त संचालक पर शत-प्रतिशत अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के अफसर हैं। यही स्थिति कृषि विभाग और विद्युत वितरण कंपनियों की है, जहां उच्च पदों पर अनारक्षित वर्ग के अफसरों की पदोन्नति के दरवाजे बंद हो चुके हैं।

बैकलॉग में कुल पदों और अनारक्षित पदों को नहीं गिना जाता

कभी भी कुल स्वीकृत पदों के साथ ही कितने भरे और कितने खाली के साथ ही अनारक्षित पदों की गणना का खुलासा नहीं किया जाता है। मप्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 10,4000 बैकलॉग पद क्रमश: 27000 अनुसूचित जाति एवं 77000 अनुसूचित जनजाति के हैं। यह गणना कुल स्वीकृत पदों के विरुद्ध इन वर्गों के वर्तमान में कार्यरत सेवकों की संख्या के आधार पर है। यहां यह तथ्य भूला गया है कि वर्तमान में कार्यरत सेवकों में शासन की स्वयं की गणना के अनुसार अजा का प्रतिशत 18 और अजजा का प्रतिशत 17 है। दोनों को मिलाकर कुल 35% प्रतिनिधित्व इन वर्गों का है, जो संविधान की भावना तथा मप्र शासन के प्रावधानों के अनुसार पर्याप्त है। यदि मात्र बैकलॉग पदों की पूर्ति शासन द्वारा की जाती है और 104000 पद भर दिए जाते हैं तो विपरीत भेदभाव (रिवर्स डिस्क्रीमीनेशन) की स्थिति पैदा हो जाएगी, जो संविधान की धारा 16 में निहित बंधनकारी समानता के व्यवहार के अनुसार नहीं होगी।

प्रदेश में कब से बने ऐसे हालात

11 जून 2002 से लागू मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002 के आधार पर पदोन्नतियों से ऐसे हालात बने। वास्तव में जिस कैबिनेट के आधार पर 100 बिन्दु रोस्टर का परिपत्र जारी किया गया था, वह परिपत्र कैबिनेट की भावना के अनुरूप नहीं था। इसके नंबर-5 में अजा के लिये 16% और अजजा के लिए 20% अर्थात कुल 36% आरक्षण की व्यवस्था है। इसका दूसरा पहलू यह है कि हर वर्ग में सामान्य वर्ग के अधिकतम 64% प्रतिशत मुलाजिम होने ही चाहिए। पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था को कोई भेद न सके इसके लिये अनुसूची 1, अनुसूची 2 और अनुसूची 3 के रूप में तीन द्वार लगे थे। लेकिन पदोन्नति के धरातल पर असलीयत कुछ और ही थी। उच्च पदों पर अनारक्षित वर्ग के लोगों का वजूद तेजी से घट रहा था।

एम. नागराज केस में सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शी निर्देश

पांच जजों की संविधान पीठ ने 2006 में एम नागराज प्रकरण में मार्गदर्शी निर्देश दिए हैं। इसमें 77वें, 81वें, 82वें और 85वें संविधान संशोधनों की समग्र समीक्षा करते हुए पीठ ने पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था को 3 शर्तों के अधीन रखते हुए पूर्ति सुनिश्चित होने पर ही जायज ठहराया। यह तीन प्रमुख शर्तें हैं-

1-यह देखना होगा कि जिसको पदोन्नत किया जाना है, वह वास्त वाले को आरक्षण की जरुरत है।

2-जिस पद पर पदोन्नत किया जाना है, वहां संबधित वर्ग का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है।

3-ऐसा करने से प्रशासनिक दक्षता प्रभावित नहीं होगी, यह सुनिश्चित करना होगा। ‘पदोन्नति में आरक्षण’ के प्रावधानों पर यह अंतिम स्थापित कानूनी व्याख्या है। इसका उल्लंघनहोने पर उत्तर प्रदेश में सितंबर 2015 में पौने दो लाख कर्मचारियों को पदावनत किया गया। कर्नाटक में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार ही लागू किया गया। बिहार में पदोन्नति में आरक्षण को राज्य सरकार ने ही रोक दिया है, महाराष्ट्र में बिना आरक्षितों को पदावनत किए सामान्य वर्गों की पदोन्नति की जा रही है। कानूनविदें का स्पष्ट कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण के संबंध में एम नागराज का आदेश ही कानून की प्रमाणित और आखिरी व्याख्या है।

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