20-07-2018 09:33:pm
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ग्वालियर बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सरकार 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ रेप करने पर फांसी की सजा का प्रावधान कर चुकी है। वहीं दूसरी ओर फांसी की सजा पा चुके बंदियों को फांसी पर लटकाने के लिए जेलों में न तो जल्लाद है और न ही फांसी का तख्ता। इस समय प्रदेश की 11 केन्द्रीय जेलों में कुल 31 बंदी फांसी की सजा में कैद हैं। इनमें से तीन बंदियों की सजा पर राष्ट्रपति मुहर लगा चुके हैं। मौजूदा समय में इन बंदियों को फांसी पर लटकाने के लिए न तो प्रदेश में कोई जल्लाद मौजूद है और न ही फांसी का तख्ता। पिछले बीस साल से एक भी बंदी को फांसी की सजा में फांसी नहीं दी गई। जिसके चलते फांसी पर लटकाने वाले तख्ते जीर्णशीर्ण हो गए। बीस साल पहले एक बंदी को पत्नी व बच्चे की हत्या के मामले में इंदौर जेल में फांसी पर लटकाया गया था। फांसी पर लटकाने का कार्य सेवानिवृत्त हवलादार ने किया था। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि यदि जो हाल ही में संगीन अपराध घटित कर जेल में आरोपी पहुंचे हैं, यदि इनमें से किसी को मौत की सजा होती है या फिर जेल में बंद 31 बंदियों में से किसी को फांसी देनी पड़ी तो जल्लाद कहां से आएगा।

तीन में ही मौजूद हैं तख्ते

जबलपुर, इन्दौर व ग्वालियर में फांसी का तख्ता बना हुआ है। लेकिन ग्वालियर में जो तख्ता बना है, उस पर काम नहीं लिया जा सकता, वह जीर्णशीर्ण हालत में है। इसके आलावा प्रदेश की आठ जेलों में तख्ता ही मौजूद नहीं है। ऐसे में यदि फांसी देनी होगी तो इन्दौर या जबलपुर जेल में बंदी को भेजना पड़ेगा।

31 बंदी फांसी की सजा में

बताया गया है कि प्रदेश की 11 जेलों में 31 बंदी फांसी की सजा में बंद है। इनमेंं 13 बंदी इन्दौर केन्द्रीय जेल में जिसमें एक महिला भी शामिल है। 12 जबलपुर केन्द्रीय जेल में, दो भोपाल केन्द्रीय जेल में, 3 ग्वालियर केन्द्रीय जेल में और एक बंदी उज्जैन केन्द्रीय जेल में बंद है। हाल ही में जो बच्चियों के साथ हुए रेप व हत्या के संगीन मामलों में यदि न्यायालय द्वारा फांसी की सजा मिलती है तो यह आंकड़ा बढ़ जाएगा।

तीन बंदियों की सजा पर राष्ट्रपति ने लगाई मुहर

इन्दौर के तीन बंदियों की सजा पर राष्ट्रपति ने भी मुहर लगा दी है, लेकिन इन तीनों बंदियों की पुनर्विचार याचिका एक एनजीओ द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई है। इसी तरह अन्य बंदियों की याचिकाएं राष्ट्रपति तथा न्यायालय में विचाराधीन हैं।

1997 में हवलदार ने दी थी फांसी

बताया गया है कि इन्दौर केन्द्रीय जेल में फांसी की सजा आखिरी बार वर्ष 1997 में दी गई थी उससे पहले 1984 में जबलपुर में फांसी दी गई थी, जिसमें एक बंदी ने फांसी देने का काम किया था। पिछले 21 साल में किसी भी बंदी को फांसी पर नहीं लटकाया गया। तब इन्दौर में जल्लाद का काम सेवा निवृत्त हवलदार बालकृष्ण बालेकर को सौंपा गया था। अब उनकी भी मृत्यु हो चुकी है।

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