20-08-2018 02:06:pm
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भोपाल मप्र में आदिवासी किसानों के बीच जैविक खेती को बढ़ावा देने के नाम पर संचालित योजना से केंद्र ने हाथ खींच लिए हैं, क्योंकि केंद्र के निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए मूल योजना में ही बदलाव कर दिया गया। यहां तक कि करोड़ों के टेंडर की शर्तें भी ऐसी रखी गर्इं, जिससे किसी खास कंपनी को ही टेंडर में पार्टिसिपेट करने का मौका मिल सका। हद तो यह कि मुख्य सचिव को भी गुमराह किया गया। चौंकानेवाला तथ्य है कि जैविक खेती प्रोत्साहन अन्तर्गत आदिम जाति कल्याण विभाग और कृषि विभाग 4 कम्पोनेन्ट पर राशि खर्च करने की सैद्धांतिक मनमानी अप्रैल से जून 2017 के बीच कर चुके थे, लेकिन मुख्य सचिव बसन्त प्रताप सिंह की अध्यक्षता में दिनांक 30 अगस्त 2017 को हुई कार्यपालन समिति की बैठक में 04 कम्पोनेन्ट की जगह सिर्फ 02 कम्पोनेन्ट को कार्यवाही विवरण में दिखाया गया। स्मरण रहे कि इस समिति में मुख्य सचिव के अलावा 37 विभागों के अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव शामिल हैं।

7 जून 2017 की बैठक के निर्देश ताक पर

मध्यप्रदेश के आदिम जाति कल्याण विभाग ने केंद्र सरकार से आदिवासियों में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए चार कम्पोनेन्ट के लिए राशि मांगे जाने के लिए दिनांक 17 जनवरी 2017 को केंद्र को पत्र लिखे जाने पर केंद्र शासन ने अपने पत्र दिनांक 08 मार्च 2017 द्वारा जब सिर्फ 2 कम्पोनेन्ट (नाइट्रोजन हार्वेस्ट प्लान्टिंग और वर्मी कम्पोस्ट यूनिट) के लिए 90 करोड़ रूपए (60:40 केंद्र राज्य अनुपात) विशेष केंद्रीय सहायता स्वीकृत की तो योजना बनाने वालों के अहम को चोट लगना स्वाभाविक था। लिहाजा राज्य स्तर पर मनमानी करते हुए 4 कम्पोनेन्ट पर ही राशि खर्च की गई। इसके लिए अशोक शाह, तत्कालीन प्रमुख सचिव, आदिम जाति कल्याण की अध्यक्षता में 07 जून 2017 को हुई बैठक में हुए निर्णय अनुसार वर्मी कम्पोस्ट यूनिट को अनिवार्य रूप से योजना में शामिल करने की शर्त को भी कृषि विभाग ने दरकिनार कर दिया।

सेसबानिया, ग्लिरिसिडिया व ढेंचा से सेसबानिया रोस्ट्राटा

भारत सरकार की परम्परागत खेती विकास योजना (पीकेवीवाय) गाइडलाइन के बिंदु 2.1.4 में नाइट्रोजन हार्वेस्ट प्लान्टिंग के लिए ग्लिरिसिडिया और सेसबानिया पौधों का उल्लेख किया गया है। लेकिन कृषि विभाग के आदेश दिनांक 18 अप्रैल 2017 में इसे सेसबानिया रोस्ट्राटा कर दिया गया। प्रख्यात इंटरनेट वेबसाइट विकिपीडिया पर सेसबानिया प्रजाति की 54 किस्में मौजूद हैं लेकिन उनमें से सिर्फ सेसबानिया रोस्ट्राटा को ही क्यों चुना गया? यह जांच और खोज का विषय है।

नेशनल सीड कॉर्पोरेशन से ढेंचा और रोस्ट्राटा के टेंडर

भारत सरकार की मिनी नवरत्न कंपनी और उपक्रम नेशनल सीड कार्पोरेशन (एनएससी) द्वारा ढेंचा और सेसबानिया रोस्ट्राटा के लिए निविदा बुलाने की प्रक्रिया में पाया गया है कि इस कंपनी के सिर्फ भोपाल रीजनल आॅफिस ने ही 17 मार्च 2017 के बाद से सेसबानिया रोस्ट्राटा की निविदाएं आमंत्रित करना शुरू की। इसके पहले भोपाल आॅफिस की ओर से 11 मई 2016, 05 एवं 11 जनवरी 2017 को सामान्य ढेंचा बीज की निविदा आमंत्रित की गई थी। एनएससी के चंडीगढ़, पटना, नई दिल्ली, लखनऊ कार्यालयों ने वर्ष 2016 और 2017 में ढेंचा बीज की ही निविदा आमंत्रित की थीं, सेसबानिया रोस्ट्राटा की नहीं।

पहले ही कर चुका था कृषि विभाग मनमानी

07 जून 2017 की बैठक में प्रमुख सचिव अशोक शाह ने वर्मी कम्पोस्ट यूनिट को अनिवार्य रूप से योजना में शामिल करने के निर्देश दिए थे। इसके 3 महीने पहले ही कृषि विभाग ने अपने आदेश क्रमांक बी 14-1/ 2017/ 14-2, दिनांक 18 अप्रैल 2017 के बिंदु क्रमांक 5.1, 5.2, 5.3 और 5.4 द्वारा प्रदेश के अधीनस्थ विभागीय अधिकारियों को निर्देश में वर्मी कम्पोस्ट यूनिट को दरकिनार कर दिया था। अर्थात राशि खर्च करने का विवेकाधिकार कृषि विभाग ने स्वयं धारण कर लिया था।

सेसबानिया रोस्ट्राटा की प्रमाणिकता नहीं

निविदा के माध्यम से खरीदा गया बीज सेसबानिया रोस्ट्राटा ही था अथवा सामान्य सेसबानिया, जो भारत में हरी खाद के रूप में प्रचलित ढेंचा बीज है, किसी के पास प्रामाणिकता नहीं है, क्योंकि निविदा के माध्यम से खरीदे गए बीज का डीएनए फिंगरप्रिंट नहीं कराया गया। इस मामले में लगभग 30 करोड़ रूपए का सेसबानिया रोस्ट्राटा खरीदा जाना पाया गया है।

दरें मार्कफेड की और ब्रांड बदल कर जैविक खाद और दवा खरीदी की गई एमपी एग्रो से

आदिवासी किसानों के नाम पर जैविक खाद और दवाई मार्कफेड की दरों पर एमपी एग्रो से खरीदी गई। यह आदान मार्कफेड से क्यों नहीं खरीदे गए इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। मार्कफेड ने प्रोम खाद के लिए सोना ब्रांड अनुमोदित की, लेकिन किसानों को सुरक्षा ब्रांड वितरित करने का उत्तर किसी के पास नहीं है। पेस्टिसाइड एवं खाद वितरण में भी अनुमोदित ब्रांड का ध्यान नहीं रखा गया, क्योंकि इस प्रक्रिया पर मॉनिट करने वाला कोई नहीं था।

सिर्फ 1 साल में ही बंद हो गई 3 साल चलने वाली योजना

जो योजना तीन साल के लिए बनाई गई थी, गड़बड़ियों के सामने आने पर एक साल में ही बंद कर दी गई। वर्ष 2017-18 और 2018-19 में भारत सरकार ने इसके लिए कोई राशि स्वीकृत नहीं की, जबकि राज्य सरकार 2016-17 की राशि से लगभग ढाई लाख किसानों को लाभान्वित करने का दावा कर रही है।

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